Bhadohi News: जब जनता के मुद्दे हों, तब खामोशी क्यों?
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भदोही में एक घटना हुई... भाजपा नेता विनय पांडे 'गोरेलाल' के साथ कथित मारपीट और गाड़ी में तोड़फोड़ के आरोप लगे। अगर किसी के साथ अन्याय हुआ है, तो दोषियों पर कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन इस घटना के बाद भदोही की जनता एक ऐसा सवाल पूछ रही है, जिसका जवाब शायद राजनीति के हर दल को देना पड़ेगा।
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| भदोही की जनता के विकास |
भदोही में भाजपा नेता विनय पांडे 'गोरेलाल' से जुड़े मामले के बाद बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता थाने पहुंचे और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की।
यदि किसी नागरिक या राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ हिंसा हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
लेकिन अब इसी घटना के बीच एक बड़ा जनसवाल भी सामने आ रहा है।
लोग पूछ रहे हैं...
क्या इसी तरह की एकजुटता कभी भदोही के विकास के मुद्दों पर भी देखने को मिली?
क्या जिले की टूटी सड़कें...
बेरोजगार युवा...
किसानों की समस्याएं...
उद्योगों की चुनौतियां...
सरकारी अस्पतालों की स्थिति...
शिक्षा, बिजली, पानी और पलायन जैसे मुद्दों पर भी कभी सभी राजनीतिक कार्यकर्ता इसी मजबूती से एक मंच पर आए?
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे पांच साल अपने जनप्रतिनिधियों से जवाब और पहल की उम्मीद करती है।
आज भदोही का एक बड़ा वर्ग यही सवाल पूछ रहा है कि जब किसी नेता या कार्यकर्ता के साथ घटना होती है, तब पूरा संगठन तुरंत सक्रिय हो जाता है।
लेकिन जब लाखों लोगों की समस्याओं की बात आती है, तब वैसी एकजुटता अक्सर दिखाई क्यों नहीं देती?
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि हर नागरिक को न्याय मिले।
लेकिन लोकतंत्र की मजबूती केवल किसी एक व्यक्ति के लिए न्याय मांगने से नहीं, बल्कि पूरे समाज के मुद्दों को समान प्राथमिकता देने से भी होती है।
विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों के मुद्दे किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे जिले के मुद्दे हैं।
यदि राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता इन विषयों पर भी उतनी ही सक्रियता दिखाएं, तो जनता का भरोसा और मजबूत होगा।
इसलिए सवाल किसी व्यक्ति का नहीं...
सवाल प्राथमिकताओं का है।
क्या भदोही की जनता के विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे भी कभी उसी स्तर की राजनीतिक प्राथमिकता बनेंगे, जैसी किसी एक घटना के बाद देखने को मिलती है?
आपकी क्या राय है?
क्या राजनीतिक दलों को जनता के रोज़मर्रा के मुद्दों पर भी उतनी ही मजबूती से सड़क पर उतरना चाहिए, जितनी किसी राजनीतिक घटना पर उतरते हैं?
अपनी राय कमेंट में जरूर लिखिए।
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